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देश की सरहद पर ड्यूटी दे रहे सेना के जवानों से अमेठी पुलिस को शांति भंग का खतरा।

PLACE - AMETHI REPORT -DILEEP YADAV सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा" के मोटो और स्लोगन पर काम करने वाली पुलिस को अब भारतीय सेना मे...




PLACE - AMETHI

REPORT -DILEEP YADAV

सुरक्षा आपकी, संकल्प हमारा" के मोटो और स्लोगन पर काम करने वाली पुलिस को अब भारतीय सेना में तैनात जवानों से शांति भंग का खतरा मंडराने लगा है वह भी ऐसे जवान जो सरहद पर देश की शांति व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं पिछले 8 महीनों से अपने घर तक भी नहीं आए हैं ऐसे जवानों से अमेठी पुलिस को शांतिभंग का खतरा होने लगा है और पुलिस उन जवानों का बगैर उपस्थिति में 107/16 में शांति भंग की कार्यवाही करते हुए सक्षम न्यायालय भेज दिया है। जैसे ही बात का पता इन जवानों के परिजन को लगा वह हैरान और परेशान हो गए सरहद पर बैठे जवानों ने कहा कि हम यहां ड्यूटी करें देश की सुरक्षा करें कि घर आकर अपनी जमानत कराएं। ऊपर से कोरोना का हाल चल रहा है कहीं आने जाने की छूट नहीं है यदि वह घर आ जाए तो यहां पर उसको क्वॉरेंटाइन किया जाएगा यहां से ड्यूटी पर जाने के बाद पोस्टिक वाले स्थान पर क्वॉरेंटाइन किया जाएगा ऐसे में देश का भी नुकसान और जवान का भी नुकसान दोनों का नुकसान ही नुकसान है। ऐसे में बड़ा सवाल अमेठी पुलिस के लिए है कि क्या अमेठी पुलिस आंख मूंद कर कार्यवाही करती है आखिर इस तरह का कार्य कैसे कर सकती है यदि यदि चौकी इंचार्ज के द्वारा किसी तरह की बदले की भावना से कार्यवाही की गई है तो उस पर थानाध्यक्ष महोदय उसके बाद  पुलिस क्षेत्राधिकारी  महोदय ने अपनी मुहर कैसे लगाई क्योंकि इन सभी चीजों से होकर गुजरने के बाद वह चालान जमानत के लिए उप जिला अधिकारी अमेठी के पास पहुंचा जहां पर नोटिस का मिलाकर आने के लिए जैसे ही पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे तब जाकर पता लगा कि अन्य लोगों के साथ सेना के जवानों का भी चालान हुआ है और उनको उपस्थित होकर अपनी जमानत करानी पड़ेगी।

 जी हां यह पूरा मामला अमेठी जनपद के संग्रामपुर थाना क्षेत्र की रिपोर्टिंग चौकी टीकरमाफी के पूरे गंगा मिश्र गांव से जुड़ा हुआ है। जहां पर हो रहे सार्वजनिक रास्ते के निर्माण को लेकर एक पक्षों में विवाद खड़ा कर दिया और मामला पुलिस में चला गया। हालांकि किसी भी प्रकार की कोई घटना नहीं हुई सार्वजनिक रास्ता पूरी तरह से बन भी गया । क्योंकि यह पूरे गांव वालों की सहमत से बन रहा था सिर्फ चंद लोगों इस में रोड़ा अटका रहे थे । लेकिन इसके बावजूद 8 अगस्त 2020 को संग्रामपुर थाने के थानाध्यक्ष राजीव सिंह के द्वारा आंख मूंदकर दूसरे पक्ष के 14 लोगों के खिलाफ शांति भंग की धारा 107/16 की कार्यवाही करते हुए न्यायालय भेज दिया गया । इन्हीं 14 लोगों में 2 ऐसे लोग हैं जो पिछले 8 महीनों से अपने घर नहीं आए हैं। देश की सेवा और सरहद पर देश की सुरक्षा कर रहे हैं जिसमें मनोज कुमार त्रिपाठी सीआरपीएफ में हेड कांस्टेबल के पद पर जम्मू के कुपवाड़ा में तैनात हैं । तो वहीं पर इसी गांव के रहने वाले लाल जी पांडे बीएसएफ में उपनिरीक्षक के पद पर राजस्थान के जैसलमेर में तैनात होकर देश की सुरक्षा कर रहे हैं। जो व्यक्ति इतने लंबे समय से अपने गांव आया ही ना हो उससे गांव वालों और पुलिस वालों को कौन सा शांतिभंग का खतरा दिखाई पड़ रहा है ? कहीं ना कहीं पुलिस के द्वारा इसमें बदले की भावना से कार्यवाही दिख रही है। जी हां आपको यह भी बता दें कि यह वही थाना है जहां पर आए दिन भारतीय सेना के जवानों के प्रताड़ित होने की खबरें मिलती है । चाहे वह एक सैनिक को अपनी जमीन बचाने के लिए एसडीएम कार्यालय के सामने बैठना पड़ रहा हो या फिर पड़ोसियों के द्वारा भारतीय सेना में तैनात जवान के पिता की हत्या होना पुलिस की नाकामी का जीता जागता उदाहरण है। पुलिस द्वारा पीड़ित जवानों के परिजनों ने अंदेशा जताया है कि उनके छुट्टी आने के बाद पुलिस के द्वारा उनके ऊपर फर्जी कार्यवाही की जा सकती है। इसलिए इस मामले में उचित कार्यवाही होनी चाहिए । परिजनों ने कहा कि जिसने भी ऐसा किया है उसके ऊपर उचित कार्यवाही की जाए । यही नहीं इसी के साथ पुलिस के द्वारा बेतुका बातें भी कही जा रही हैं। उनके छुट्टी आने के बाद शांति भंग का खतरा हो सकता है। इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही की गई है । ऐसी पुलिस से भगवान बचाए जनता तो भगवान भरोसे ही है। वहीं पर इस मामले में जब जिले के पुलिस अधिकारियों से पूरा मामला जानने की कोशिश की गई तब अधिकारी महोदय कैमरे के सामने आने से मना कर दिया। दूरभाष पर ही उन्होंने बताया की 107/16 अर्थात शांति भंग की कार्यवाही में किसी के रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि पुलिस को लगता है कि उससे शांति भंग का खतरा हो सकता है तो उसके खिलाफ कार्यवाही वह कर सकती है । यह एक प्रकार की निरोधात्मक कार्यवाही है यह मुकदमा नहीं है। लेकिन अब अधिकारी महोदय को कौन बताए की भले ही यह मुकदमा नहीं है लेकिन सक्षम न्यायालय के सामने स्वयं उपस्थित होकर जमानत करानी पड़ती है। ऐसे में सरहद पर तैनात यह दोनों जवान कैसे अपनी राजकीय की ड्यूटी छोड़कर जमानत कराने पहुंचेंगे ? जिनको इन लोगों ने कोर्ट कचहरी के चक्कर में उलझा दिया है। ऐसे में अधिकारी महोदय भी गलत को सही सिद्ध कर पुलिस की साख बचाने में लगे हुए हैं।



वहीं पर जब इस मामले में कानून के जानकार एडवोकेट राजेश मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने बताया कि यह सर्वथा अनुचित है । लड़ाई झगड़े और मारपीट की आशंका पर यह कार्यवाही की जाती है। इसमें वीट सिपाही के द्वारा चलानी रिपोर्ट बनाकर तहसील भेजा जाता है। जिसमें जिनको जिनको निरुद्ध किया जाता है । उनको तहसील पहुंचकर जमानत  कराना पड़ता है । अगर नहीं पहुंचेंगे तो गैर जमानती वारंट जारी होगा । जहां पर मुख्यमंत्री द्वारा लगातार कहा जा रहा है कि पुलिस की छवि को साफ सुथरा बनाया जाए । लेकिन दुर्भाग्यवश सेना का जो जवान राजस्थान और जम्मू कश्मीर में पोस्ट है। वह लोग 8 महीने से घर भी नहीं आए हैं कितना अंधा होकर सब इंस्पेक्टर, इंस्पेक्टर और बीट का सिपाही उन लोगों को 107/16 में पाबंद कर दे रहा है। पुलिस का एक भय होता है जब घर पर पुलिस जाती है तो उनके परिजनों को एक झटका लगता है कि आखिर पुलिस यहां पर क्यों आई है ? इसके बाद जो देश की रक्षा कर रहा है वह फौजी जो दिन-रात देश के लिए संघर्ष कर रहा है । जब उसको घर से सूचना जाती है कि घर पर पुलिस आई थी । आप को जमानत करवाना है तो उसके ऊपर क्या गुजरती है। यह बहुत ही गैर जिम्मेदाराना रवैया पुलिस का है। विशेष रूप से संग्रामपुर और अमेठी पुलिस तो फौजियों के पीछे पड़ गई है। सरकार का जो प्रावधान है उसमें नाबालिक का  और 60 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों का 107/16 में चालान नहीं किया जाता है। पुलिस अंधाधुंध पैसे की कमाई के चक्कर में इस तरह का काम कर देती है। यह गलत बात है और निंदनीय है । ऐसा नहीं होना चाहिए नहीं तो ऐसी बातों से सेना के जवानों का मनोबल टूटता है  और पुलिस पर उंगलियां उठती है। ऐसे में बिना उन लोगों के यहां पर जमानत नहीं हो सकती क्योंकि मामला न्यायालय फौजदारी का हो गया है। इसी के साथ कभी कभी पुलिस इसको वापस भी ले लेती है । यह पुलिस को पावर है कि वह चलानी रिपोर्ट को वापस मंगा ले । जिसमें वह न्यायालय से क्षमा प्रार्थी होकर कर कर सकती है । क्योंकि अब यह मामला न्यायालय का है वह चाहेगी तो वापस करेगी वह चाहेगी तो जमानत है कि वह चाहेगी तो उसको आना पड़ेगा जो न्यायालय चाहेगी वही होगा । नहीं तो नोटिस वहां तक जाएगी जहां पर वह ड्यूटी करते हैं । उनको जमानत तो करवानी पड़ेगी और बिना आए जमानत नहीं हो सकती





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